15 जून, 2026, मोतिहारी, बिहार
राष्ट्रव्यापी खेत बचाओ अभियान–2026 के अंतर्गत, भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप–एमजीआईएफआरआई), मोतिहारी ने बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के विभिन्न प्रखंडों के पंचायत प्रतिनिधियों एवं किसानों के लिए हरी खाद, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और संतुलित उर्वरक उपयोग पर एक “मुखिया सम्मेलन” तथा जागरूकता-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया।
कार्यक्रम का केन्द्रीय संदेश था – “स्वस्थ मिट्टी, समृद्ध किसान: सतत कृषि के लिए हरी खाद”, जिसमें हरी खाद, फसल विविधीकरण, दलहनी फसलों के समावेशन, संतुलित उर्वरक उपयोग, अवशेष पुनर्चक्रण तथा मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन के महत्व पर बल दिया गया।
प्रतिभागियों को सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने में सामुदायिक सहभागिता के महत्व से अवगत कराया गया। इस कार्यक्रम में पंचायत प्रतिनिधि (मुखिया), किसान और वैज्ञानिक एक साथ आए तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार और रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के व्यावहारिक उपायों पर चर्चा की।
तकनीकी सत्र के दौरान, विशेषज्ञों ने मृदा उर्वरता की पुनर्बहाली और फसल उत्पादकता को बनाए रखने में हरी खाद, दलहनी फसलों और फसल विविधीकरण की भूमिका पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन से पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार, लागत में कमी और दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य में वृद्धि की जा सकती है।
बिहार की धान आधारित कृषि प्रणालियों के लिए हरी खाद फसल के रूप में सेसबानिया (ढैंचा) की क्षमता पर विशेष प्रकाश डाला गया। अच्छी तरह विकसित ढैंचा की फसल लगभग 50–60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर का योगदान कर सकती है, जो लगभग 110–130 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर (लगभग 2.5–3 बोरी यूरिया) के बराबर है। साथ ही यह मृदा में कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्मजीवी गतिविधि और मृदा संरचना में भी सुधार करती है। किसानों और पंचायत प्रतिनिधियों को धान की रोपाई से पूर्व ग्रीष्मकालीन मौसम में ढैंचा की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया गया। हरी खाद पर एक जीवंत खेत प्रदर्शन भी आयोजित किया गया, जिसमें सेसबानिया के पौधों, जड़ ग्रंथियों तथा उनकी जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता को प्रदर्शित किया गया। प्रतिभागियों ने केंचुओं की गतिविधि और मृदा की जैविक स्वास्थ्य से संबंधित प्रदर्शनों का भी अवलोकन किया, जिससे सतत कृषि में जीवित मिट्टी के महत्व को रेखांकित किया गया।

वरिष्ठ अधिकारियों ने उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया और पंचायत प्रतिनिधियों से मृदा परीक्षण, संतुलित उर्वरीकरण, फसल अवशेष प्रबंधन तथा सतत कृषि पद्धतियों के बारे में जागरूकता फैलाने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खेत बचाओ अभियान के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम के दौरान रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मृदा की जैविक स्वास्थ्य में सुधार लाने में जैव उर्वरकों एवं पर्यावरण-अनुकूल पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया। वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों को फसल अवशेष जलाने के दुष्प्रभावों के प्रति भी संवेदनशील बनाया तथा प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों के अनुरूप टिकाऊ अवशेष प्रबंधन विकल्पों का प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम ने रासायनिक उर्वरकों, जैव उर्वरकों, जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेष पुनर्चक्रण और दलहनी फसलों को शामिल करते हुए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को बढ़ावा दिया, ताकि मृदा उर्वरता और पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार किया जा सके। प्रतिभागियों को उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के दीर्घकालिक दुष्परिणामों, जैसे पोषक तत्व असंतुलन, मृदा गुणवत्ता में गिरावट और खेती की बढ़ती लागत के बारे में भी जागरूक किया गया।

मुखिया सम्मेलन का समापन पंचायत प्रतिनिधियों और किसानों की इस सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ हुआ कि वे अपने-अपने गांवों में चल रहे खेत बचाओ अभियान 2026 के तहत मृदा परीक्षण, हरी खाद, संतुलित उर्वरक उपयोग और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देंगे।
कार्यक्रम में कुल 37 प्रतिभागियों ने भाग लिया और वैज्ञानिकों के साथ सक्रिय संवाद करते हुए पश्चिम चंपारण जिले में मृदा स्वास्थ्य जागरूकता को सुदृढ़ करने के लिए गांव-स्तरीय रणनीतियों को साझा किया।
(स्रोत: भाकृअनुप–महात्मा गांधी एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी, बिहार)







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