भारतीय मत्स्य क्षेत्र आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ता हुआ उत्पादन क्षेत्र है तथा खाद्य, पोषण, सामाजिक-आर्थिक विकास के संदर्भ में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है एवं समाज के एक बड़े वर्ग को आजीविका प्रदान कर रहा है। घरेलू मांग को पूरा करने के अलावा, यह क्षेत्र निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जन में भी उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। यह क्षेत्र अनेक सहायक उद्योगों के लिए व्यावसायिक संभावनाएं और अवसर भी उत्पन्न करता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) के विभिन्न संसाधन-विशिष्ट मत्स्य अनुसंधान संस्थानों ने देश में मत्स्य क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) के अंतर्गत मत्स्य विज्ञान प्रभाग पांच संसाधन-विशिष्ट मत्स्य अनुसंधान संस्थानों अर्थात् भाकृअनुप-केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई), भाकृअनुप-केन्द्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), भाकृअनुप-केन्द्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआईएफटी), भाकृअनुप-केन्द्रीय मीठाजल जीवपालन अनुसंधान संस्थान (सीआईएफए), भाकृअनुप-केन्द्रीय खारा जल जीवपालन संस्थान (सीआईबीए); एक डीम्ड विश्वविद्यालय, भाकृअनुप-केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान (सीआईएफई); एक ब्यूरो, भाकृअनुप-राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएफजीआर) और एक निदेशालय, भाकृअनुप-शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय (डीसीएफआर) के मत्स्य पालन और जलीय कृषि में अनुसंधान एवं शैक्षणिक कार्यक्रमों का समन्वय और निगरानी करता है, जिन्हें उनके क्षेत्रीय/अनुसंधान/फील्ड केन्द्रों के व्यापक नेटवर्क द्वारा भी सहायता प्रदान की जाती है। मत्स्य विज्ञान प्रभाग ने समुद्री कृषि, मत्स्य स्वास्थ्य प्रबंधन, सजावटी मछलियों के प्रजनन एवं पालन और रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर नेटवर्क परियोजनाएं भी शुरू की हैं और ‘जीनोमिक्स’ पर एक कंसोर्टियम रिसर्च प्लेटफॉर्म (CRP) परियोजना का भी समन्वय कर रहा है।
मत्स्य अनुसंधान संस्थानों के अनुसंधान कार्यक्रमों को सुदृढ़, पुनर्गठित, पुनः उन्मुख और प्राथमिकता प्रदान की गई है, जिसमें संसाधनों के इष्टतम और सतत उपयोग के माध्यम से मत्स्य उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया गया है तथा मत्स्य संसाधनों के संरक्षण पर समुचित बल दिया गया है, ताकि मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्रों की पूर्ण उत्पादन क्षमता को साकार किया जा सके और महत्वपूर्ण अनुसंधान अंतरालों को दूर किया जा सके। अनुसंधान कार्यक्रमों में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता लाने के लिए अनुसंधान कार्यान्वयन, निगरानी एवं मूल्यांकन तंत्र को भी सुदृढ़ किया गया है।









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